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भगवन श्री राम प्रशाद जी

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आर्यावर्त भारत की पुण्य सलीला धरा के अंतगर्त] हरि का प्रदेश हरियाणा] पावन पवित्र धन्य धरा] &रिंढ़ाणा जि0 रोहतक&वर्तमान सोनीपत। पीपल वंश जैन के प्रसिद्ध जैन कुल की मूर्धन्य प्रतिष्ठा] सेठ शादी राम जैन के प्रपौत्र] श्रावक गंगाराम जैन के पौत्र एवं पिता बद्री प्रसाद जैन के कुलावतार&संस्कार एवं सेवा के महाप्रतिष्ठ&पुराण पुरुष। सेठ बद्री प्रसाद जैन की कौसल्या&तृष्णा&सीता सी पावन नारी श्रेष्ठ&पत्नी Þभुल्ला जैनß की कोख से 9 मई 1930 को जन्में। पावन पुत्र नाम&प्रसिद्ध हुआ Þरामप्रसादß जैन। सेठ बद्रीप्रसाद के प्रथम पुत्र प्रकाश चन्द्र&अन्तिम पुत्र Þरामप्रसादß। रामप्रसाद जन्म के मात्र 6 दिवस बाद भुल्ला मातेश्वरी&दिवंगता अर्थात स्वर्गस्थ हो गई। जैसे मिसाइल सेटेलाइट को उपग्रह कक्षा में स्थापित कर] स्वयं नष्ट होकर विश्व&दर्शन का दायित्व सेटेलाईट को देती है। वैसे ही भुल्ला मां ने विश्व&दर्शन का दायित्व भरा आलोक संसार को सौंपा।

सेठ बद्री प्रसाद जैन की उस समय उम्र 23 वर्ष। गौर वर्ण] छरहरी शरीर सम्पदा] संस्कार] समृद्ध] जैनत्व की उत्कृष्ट विभूति ने] पत्नी दाह संस्कार Þचिता स्थलß पर आजीवन भविष्य में ब्रह्मचर्य की उत्कट] विकट प्रतिज्ञा ग्रहण की] पुनर्विवाह न करवाने का दृढ संकल्प लेकर] चित्ता स्थल को पावन यझ स्थल बना दिया।

पिता श्री के सँस्कारो वात्स्सल्य एवं दृढ़ अनुशासन से परिपुष्ट। भातृ युगल] बुद्धि में बृहस्पति] संस्कारो में श्री राम एवं दृढ़ता महावीर] जैसी सौभाग्य में शालिभद्र एवं पुण्यवानी में कयवंन्ना बन गए। बचपन से संस्कार] सेवा एवं गुरु विनय से विद्या के लिए] बुद्धि के कपाट यूँ खुल गए] जैसे इंद्र सभा में] इंद्र प्रवेश पर द्धार खुलते है। जैनत्व की सुदृढ़ निष्ठा तथा सभी धर्मो के समन्वय के समावेशी संस्कारो से उदात्त] उदार] व्यक्तित्व का सुघड़ निर्माण हुआ। पिता श्री के वस्त्र व्यापार कटरा] लेहस्वान चांदनी चौक की प्रसिद्धि प्राप्त प्रतिष्ठा के संस्थान के सहायक बन कर भी] वीतराग] वैराग्य भावना से भर उठे। पिता के सर्वस्व त्याग के] नचिकेता के पौराणिक आख्यान का पुनरावर्तन हुआ। तीनो पिता पुत्र वैराग्य पथ के संकल्पी बने। सेठ बद्री प्रसाद जैन ने अपने अग्रज सेठ दुलीचंद को सम्पूर्ण] सर्वस्व सौप कर] वैराग्य संकल्प का अटल एवं अपरिवर्तित निर्णय दोहरा दिया।

ममत्व के इस विस्फोटक] ह्रदय विदारक] वर्ण शूल से सन्देश से] चीत्कार भरे] सेठ दुलीचंद के रुदन ने] चांदनी चौक की भावनात्मक स्नेह] सम्बन्ध] परिजन] व्यापारी वर्ग की आस्था को झकझोर दिया। सर्वस्व त्याग के इस शौर्य को] नाती जनों एवं साथ खेलें पुरुषों के मनुहार भरें] ममतामयी अनुनयी भाषा भी डिगा ना सकी। लाल किला कांप उठा] शीशगंज का गुंबद शौर्य भरे पराक्रम को देख कर उठा और वैराग्य पथ पर बढ़ चले साहिब और साहिबज़ादे। उस वैराग्य अभिनिष्क्रमण के प्रत्यक्ष दृष्टा] इस कथानक को सुनाते वक्त] यू सुर्ख गाल हो उठते हैं जैसे रामकथा कहते हनुमान लाल सुर्ख हो उठता है। इतिहास की अनुपम अद्भुत कौशल वैराग्य कथा है।

यदा-यदा हि धर्मस्य-ग्लानिर्भवति भारत

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18 जनवरी 1945 को] नारनौल हरियाणा के सीमांत शहर में] महावीर परंपरा के श्रेष्ठतम शुद्ध संत] श्रेष्ठ व्यक्तित्व] महामहिम] पंजाब परंपरा के सिंह पुरूष] पूज्य व्याख्यान वाचस्पति श्री मदन लाल जी महाराज का शिष्यत्व प्राप्त कर] परंपरा के स्वर्णिम सतयुग समय का] श्रीगणेश] संकल्प पत्थर रख दिया। विज्ञान एवं धर्म के दवंद्व में उलझे समय की सलवटो को सुलझाने को त्रिमूर्ति का अवतरण हुआ। श्री कृष्ण के पावन उद्घोष Þयदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतम्ß संयम को उखाड़ती विज्ञान की चुनौतियों के बीच] तीनों पिता पुत्र का प्रतिज्ञा सूत्र] सस्वर होकर] जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा को] कुमकुम लगाने को] मचल उठा। पिता बद्री प्रसाद मुनि ने तप की कठोरता पर] कोमल सौंदर्य की आहुति दी। शास्त्र वर्णित एक आसन आहार प्रतिज्ञा से शिव शंकर] शिव बन गए। कलयुग में सतयुगी शास्त्रों की कठोर साधु चर्या की अनुपम कृति बने। सत्य के लिए सुदर्शन चक्र सा निर्णायक संकल्प] आगमों की जीवंत से व्याख्या टपकने लगी। मुनि प्रकाश ने सेवा] स्वाध्याय] संयम की त्रिपथा से मौन एकांत जीवन से श्रेष्ठ बने। आधी दैविक शक्तियों ने इन्हें अपना एक मात्र घर मानकर] इनकी वाणी एवं हाथों में वरदान बनकर वास किया। वह अप्रतिम निरंतर ज्योति] आज भी श्रद्धा वशात दर्शनीय] वंदनीय] पावन प्रतिष्ठा प्राप्त है।

भगवन श्री राम प्रसाद जी महाराज] सरल बचपन] निर्विकार जवानी] संतुष्ट वार्धक्य सल्लेखना सहित] केवली मरण सा शांत अंतिम समय। उनके व्यक्तित्व का स्वर्ण कलश है। बचपन में शांत मातृ वियोग में भी] सावधान संस्कार संपदा प्राप्त की। प्रांजल कोष्ठक बुद्धि में] प्रत्युत्तपन्न आधिकता ने अर्थात विषय की शीघ्र ग्राह्यता ने] उन्हें सरस्वती पुत्र बना दिया। ब्रह्मा जैसा सर्व संपन्न कृतित्व पाकर] महावीर की वीतरागता पर] जवानी को कुर्बान किया। राम सरीखी मर्यादा पुरुषोत्तम छवि ने] उनकी सहनशीलता को चार चांद लगा दिए। श्री कृष्ण का कर्म योग] महावीर के पुरुषार्थ वाद का रूपांतरण बन गया। गौतम सरीखी कि विनय ने ज्ञान के नेत्रों को पूरे तौर पर खोल दिया। विद्वता के सभी मानकों को पार कर] कलयुग में श्रुत केवली कहलाए।

सांप्रदायिक उन्माद या उन्मेष से अछूते रहकर] सर्व जीव कल्याण उत्थान] एवं सम्मान के लिए ह्रदय को उदार उदात्त बनाया। ओसवाल] अग्रवाल] जाट] अहीर] नाई] हरिजन] वाल्मीकि] सुनार] लुहार] कुम्हार] मनिहार] सैंसी से लेकर क्षत्रिय तक] ब्राह्मण से लेकर वैश्य तक] सभी उनकी कृपा से सनाथ रहे। सनातन धर्म के वेदांत की] सांख्य एवं मीमांसकों की] चार्वाक एवं नैयायिकों की] व्याख्या ग्रंथों के ब्रह्मा कहलाए। आर्य समाज के मूर्धन्य विद्वानों के आदरणीय प्रभु बने। बौद्धों के भदन्त आनंद कौशल्यायन जैसे विश्वमान्य मूर्धन्य विद्वानों के वंदनीय ग्रुरु पद प्राप्त रहे। गीता रहस्य उपनिषदों एवं पुराणों के ब्रह्मर्षि कहलाए। जैनागमों की व्याख्या में] पुरातन टीका कारों के अनसुलझे संदर्भों को सुहेला सुलझा कर] व्याख्या कर] गौरवान्वित हुए। विज्ञान एवं धर्म की विपरीत दिशाओं में धर्म ग्रंथों के संदर्भो पर बढ़ते विज्ञान को] धर्मपुत्र तो कहा] पर उसे धर्म सिद्धांतों को जुठलाने वाला हरिण्यकशिपु माना। विज्ञान भौतिक व्याख्या में अग्रगण्य है] तो धर्म एवं धर्म ग्रंथ आआध्यत्म क्षेत्र में आत्मा के मूल को स्वीकार कर] परमात्मा की सिद्धि का पावन पथ है।

विज्ञान और आत्मा का समन्वय कर] भगवन श्री ने] धर्म ग्रंथों के सत्य को विज्ञान का पथ प्रदर्शक सिद्ध किया। पंच भूतों की आगमिक व्याख्या के आधार पर विज्ञान को उसका वशवर्ती अन्वेषक माना। उसे शरीर सुख&साधन एवं राष्ट्र रक्षा के साथ] परमाणु दोहन से ऊर्जा का उद्घाटन करने वाला बताया। विज्ञान के छल प्रपंचों में] तन मन को गुलाम बनाने वाले साधनों को असेवी बताया तथा कल्याण एवं ब्रह्मत्व प्राप्ति] प्रभु पद प्राप्ति के रास्ते में बाधक माना। वीतराग पथ] अध्यात्म का अन्वेषक] इन सुखों से विरक्त वैरागी रहता है। इसलिए वे इन सुखों से विरक्त रहकर] साधना पथ पर बढे।

जैनत्व में आस्तिकता एवं साधना के मूल तत्व] आत्मा के अस्तित्व के अनुभूत सत्य के साक्षात कर्ता बने। उन्होंने ज्ञाता द्रष्टा भाव को निजी पवित्र चरित्र से प्राप्त किया।

वे जैनत्व की पराकाष्ठा का प्रारंभ 7 कुव्यसन त्याग से मानते थे। जो व्यक्ति मांस] अंडा] शराब] जुआ] चोरी] शिकार] पराई स्त्री] वेश्या के व्यसन से ग्रस्त है। वह व्यक्ति अध्यात्म के स्वर व्यंजन का ज्ञाता नहीं हो सकता। वे बाहय क्रियाओं को व्यवहार एवं सामाजिक व्यवहार मात्र मानते थे] लिंग और वेश कल्याण कर नहीं है] वह केवल परिचय मात्र है। अध्यात्म का प्रारंभ आत्मा के अस्तित्व की अनुभूति से प्रारंभ है। जिसे जैनों ने सम्यक्त्व कहा है। जो 7 कुव्सन का पूर्णत: त्यागी नहीं] वह जैन कभी नहीं हो सकता। जैन होने की पहली शर्त है] 7 कुव्सनो का त्याग करना। वे इस सप्त&शील] धरातल के आधार पर धर्म की आस्था] आचरण के वाक्य प्रारंभ करते थे। वे प्रयोगात्मक संंत थे] मात्र सांप्रदायिक अभिनिवेश आग्रह से ग्रस्त नहीं थे।

इसीलिए जैन किसी जातिगत बंधनों का गुलाम ना हुआ। वह वर्ण] जाति] देश] कबीले एवं रंग रूप से अलग रहकर] मानव मात्र का हित चिंतक रहा। भगवन श्री ने] इस महावीर सत्य को खूब फैलाया। वह स्वयं सभी के श्रद्धेय एवं सम्मान्य रहे। भगवन श्री] जैन धर्म के मूल सूत्र या मूल तत्व Þविणंय मूलो धम्मोß धर्म का यह मूल विनय है। गुरु जनो] वृद्ध जनों एवं ज्ञानी जनों] प्रबुद्ध] स्वयंबुद्धो कि विनय से विकास के रास्ते खुलते हैं। कोरा ज्ञान भटकन भरा है। जब ज्ञान की लगाम श्रद्धा के हाथों में आती है तो] वह सधा हुआ घोड़ा बनता है। चारित्र उसका शक्ति विस्फोट करता है। भगवन श्री में विनय] जीवन एवं आचरण बन गया था। वे शास्त्रों के मूल प्रश्न कर्ता गौतम जैसी] विनय] संपन्नता से] इस युग में उदाहरण बन गए थे। स्वभाव इतना नम्र] मिलनसार] सर्वजन सुलभ था कि हर व्यक्ति उन्हें अपने सन्निकट माता&पिता] बंधु] मित्र] गुरु जैसा मानता था।

भगवन श्री का प्रयोगात्मक अध्यात्म] इतना सशक्त हो गया था कि समस्त लोक&परलोक की विभूतियां] ऋद्धिया] सिद्धियां] एवं चमत्कारिक शक्तियां] उन्हें अपना आश्रय एवं आराध्य मानती थी। उनके इशारों से सब अरिष्ट] पीड़ा] बाधा] अंतराय तथा दृढ़ कर्म बंधन] सौम्य] सुखद होकर अनुकूल फलदाई हो जाते थे। इसलिए हर संसारी जन उनके सानिध्य से] सुख एवं कष्ट निवारण] प्राप्त कर] हर्ष संपन्न होता था। उनके अध्यात्म से प्रभावित] अनेक योग जिज्ञासु] ज्ञान] पिपासु एवं आत्म रहस्य के अन्वेषु जन] चरणों में समाधान पाने आते थे।

वे आत्म ज्ञान को चारित्र में ढालने की कला में पारंगत] प्रवीण थे | उनके सानिध्य में बैठकर भव्य भविक जन] स्वयं के भीतर] अनहद नाद के 16 स्वरों से गुंजायमान हो उठते थे। भक्तजनों के भीतर प्रकाश पुंज लहराने लगता था। उनको ध्यान योग में बैठे देखकर उनके आस&पास के प्रकाश पुंज की परिधि को] सहन करना] हर किसी के वश में नहीं था। उन्होंने अनेकों चामत्कारीक संदर्भों के रहस्यो को निज साधना से श्रेय सिद्धि तक पहुंचाया।

वे विभूति संपन्न शुद्ध निर्लेप] निरञ्जन] अलख अगोचर भाव के संत थे। वे प्रतिष्ठा] मान सम्मान एवं परिचय के आवरण से दूर रहकर] स्वयं के अन्वेषण में लगे रहते थे। देश विदेशों के भक्त जन] उनके चरणों में बैठकर आनंदानुभूति से भर उठते थे।

भगवन श्री राम प्रसाद जी महाराज] कलियुग में सनातन जन उन्हें श्री राम एवं श्री कृष्ण का अवतार मानते थे। बौद्ध लोग उन्हें] बुद्ध पुत्र कहते थे। जैन लोग इस युग में उन्हें श्रुत केवली कहते तो] आर्य समाजी उन्हें स्वामी दयानंद सरस्वती का अवतार कहते थे। मुस्लिम लोगों ने पैगंबर का प्रारूप कहा। परंतु वे स्वयं में इंसान के वेश में श्रेष्ठ्तम संत थे।

भगवन श्री में राग&द्धेष का लेश नहीं था। इंद्रिय विजय के वे उदाहरण थे। भौतिक संसाधनों के सेवन से सर्वथा विरक्त रहकर] प्राकृतिक भाव में जीते थे। उन्होंने इस तन को तपाकर कुंदन बना लिया था। उनके तन से छूकर आने वाली हवा निरोगी थी तथा निरोगता देती थी। उनकी हवा की दवा में छिपी] दुआ से कुष्ठ चर्म एवं कैंसर जैसी ग्रंथि से ग्रस्त लोग स्वस्थ हुए। भगवन श्री के पसीने को लगाकर गंड] शूल] वर्ण जैसी व्याधियां शांत हो गई। उनके चरणों की रज से ऊषर] बंजर] आंगन सरसब्ज हो गए। जिस संस्थान में उनके चरण कमल पधारे] वो सुस्त पड़े] हानि की तरफ जाते उद्योग समृद्धि के सदन बन गए। जिस दुकान पर निकलते] सहज में मंगल पाठ किया। वहां सौभाग्य गुनगुनाने ईठलाने लगे।

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भगवन श्री की मुस्कराहट में] सभी मंत्रो की सिद्धियां] इठलाती थी। उनके स्मित] मुस्कराहट भरे हास्य में] उपासक की बैचैन मानसिक ग्रंथियों से थकी हारी] चेतना में कार्य शक्ति का संचार होता था। वे बाह्य कर्म कांड] क्रिया कांड] से एकदम दूर] शुद्ध साधना के सिद्धि मंत्र बन गए थे। वे पाखंड एवं प्रपंच रच कर भक्तों को अपने मायाजाल में उलझाने वाले] ढोंगी जनों को सावधान करते थे। वे संसार भय से भयभीत] थके] मन तोड़े लोगों को श्रेष्ठता का शुद्ध मार्गदर्शन देते थे।

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