
भगवन श्री राम प्रसाद जनै , गौ सेवा सदन (रजि .)
(सचं ालि त: आर्य वज्र स्वाध्याय सघं (रजि .) भारत

भगवन श्री राम प्रसाद, गौ सेवा सदन एक रजि स्टर्ड सस्ं थान है। जनै धर्म दर्शनर्श मेंगऊ का वि शषे सम्मान एवं गौरव वर्णि तर्णि है। जनै धर्म के 12 अगं सत्रू ों (मलू आगमों) में, उपासक दशांग नामक सातवेंअगं में, जनै धर्म के शीर्ष दस श्रावकों (गहृस्थों) का वर्णनर्ण है। वहां पर प्रत्येक श्रावक के सम्पति वर्णनर्ण में, कृषि एवं गौकुलों का वि शषे वर्णनर्ण है। एक-एक गोकुल में10000 सेऊपर गोधन का उल्लेख भारतीय सस्ं कृति की आरोग्य एवं दग्ुध दान की सर्वश्रर्व ेष्ठ तीर्थ रूप गौ माता का वर्णनर्ण है। वही गौ सेवा सेपण्ुय की वि शषे पराकाष्ठा का वर्णनर्ण है। जनै धर्म मेंसेवा सेप्राप्त दग्ुध को अमतृ कहा है। देह उत्पीड़न सेया लोभवश अधि क दग्ुध उत्पादन हेतुपशुके चारा या इंजेक्शन के प्रयोग को जनै हि सं ात्मक एवंशोषण रूप मानता है। ऐसेदग्ुध का प्रयोग भी, अपेय एवंउससेबनेखाद्य पदार्थों को भी अखाद्य श्रेणी मेंमानतेहैं।
जनै धर्म करुणा एवं दया प्रधान अहि सं ा मलू का धर्म है। जनै धर्म वसै ेतो सक्ष्ू म सेस्थल तक की सभी चराचर प्राणि यों की रक्षा का उपदेश पर्णू र्णआचरण का धर्म है/ लेकि न गौ सेवा या दग्ुध दान कर्ता प्राणी वर्ग को, अपनेजीवन एवं खरुाक का जहांसाधन मानता है। उसमेंसेवा को प्रथम मान, कर्तव्र्त य मानकर प्राप्ति के साथ दया का धर्म है।
जसै ेमां-बाप सर्वदर्व ा सर्वथर्व ा सदा काल पज्ू य है। ऐसेही यह दग्ुध दान करनेवालेप्राणी, हमारेमानव समाज के सर्वश्रर्व ेष्ठ उपकारी है/ मां-बाप की सेवा जीवनान्त तक प्रथम मानकर करना उत्तम पजू ा है/ भगवान की पजू ा सेभी प्रथम एवं सर्वश्रर्व ेष्ठ कर्तव्र्त य है/ वि नय है, तो धर्म है/ ऐसेही पशुसेवा करना, दधू देनेमें, हल जोतने मेंभार ढोने में, अक्षम होनेपर भी उनके बराबर सेवा करना, उत्तम कोटि मेंमाना है/ अगर कोई ऐसा ना करके, उन्हेंकाटने मरनेके लि ए खलु ा छोड़ देया कसाई के यहां बेच देतो, इससेबड़ा घोर नशं ृ स कर्म अन्य जनै धर्म नहींमानता। ऐसा स्वार्थी व्यक्ति नरक योग्य या पशुयोनि योग्य दष्ुट क्रूर कर्म बांधकर भवि ष्य मेंदीन हीन कंगाल स्थि ति को प्राप्त करता है। सच्चा जनै कभी भी, इस तरह का दष्ुट कर्म स्वार्थ मेंभरकर नहींकरेगा। अगर कोई ऐसा करेतो, वह नाम मात्र का जनै है। जनै श्रावकों को सतं ों का सर्वश्रर्व ेष्ठ सर्वो त्तम एवं प्रथम उपदेश था. 10 कोस पर प्याऊ, 20 कोस पर गोकुल। आज भी दक्षि ण भारत, मध्य भारत सहि त भारत में६५ % जनै ों के सर्वश्रर्व ेष्ठ गोकुलधाम है। जनै धर्म पजू ा नहीं, सेवा को धर्म मानता है। पर्वो पर गौ पजू ा करनेवाले, जब उन्हेंकाटनेहेतुबेचतेहैंया खलु ा छोड़ देतेहैं, तो वह व्यक्ति अधम श्रेणी मेंहै। जनै शास्त्रों नेपजू ा का उपदेश ना देकर, सेवा का उपदेश दि या है। रक्षा का सदं ेश प्रत्येक सक्ू त मेंभरा है। जनै मत्रं ो नहीं, सेवा मेंसच्चा हि त नि हि त मानता है आज भी जनै धर्म - समाज मेंगौ सेवा या गौ वशं की बराबर सेवा को सर्वो त्तम धर्म माना है। जनै धर्म के प्रथम तीर्थंकर्थं र ऋषभदेव का चि न्ह नदं ी है। इस नदं ी का मलू गौ है, अतः गौ सेवा भारतीय सस्ं कृति एवंसस्ं कार का मलू है। इसी उद्देश्य की पर्तिूर्ति के लि ए, “आर्य वज्र स्वाध्याय सघं ” नेअपनेयगु परुुष, पज्ू य परुुष भगवन श्री राम प्रसाद जी महाराज के करुणामय जीवन सदं ेश के आधार पर “भगवन श्री राम प्रसाद जनै गौ सेवा सदन ” की स्थापना की।

“ भगवन श्री का महावाक्य ”
“मेरेदेश मेंमदि रालय एवंबच़ू डखानों की जगह वि द्यालय एवंगौशाला बने”

भगवन श्री राम प्रसाद जी महाराज के महावाक्य को आधार बनाकर स्थापित कि या।
१ आप इस गौ सेवा यज्ञ मेंहमारेसाथ जड़ुे
२ स्वच्छता- स्वास्थ्य -सेवा के लि ए सहयोगी बने
३ गौ सेवा ही नहींगौवशं सेवा भी बराबर पण्ुयवर्धकर्ध है
४ हम बछड़ों को भी पज्ू यता का स्थान बराबर देतेहैं
५ आप एक पशुगोद लेकर महापण्ुय बटोर कर, अपनी सपं त्ति सौभाग्य को अमर अखडं बना सकतेहैं।
६ अपनेलि ए तो हर प्राणी कमाता खाता है, जो मकू पशुपक्षी हेतुदान करें, वह सच्चा धर्मा त्मा है।
७ मदिं दिर बनाना, प्रति ष्ठा करवाना, धार्मि कर्मि एवंसामाजि क कर्तव्र्त य है, पशुसेवा मानव धर्म है।
८ अतः साथि यों आप हमारेसेजड़ुकर महापण्ुय प्राप्त करें, हमारेसहयोगी बने।
१० . आप शहरीकरण वश पालन स्वयंनहींकर सकते तो हमारेसाथ जड़ुकर बराबर सेवा लाभ ले।
११. नौ ग्रहों की उपशांति का सबसेबड़ा मत्रं या जप
१२. यज्ञ है, गौवशं सेवा सेजड़ुना है।
८० जी सेकर मक्ुत / प्रत्येक वर्ष बराबर ऑडि ट रि पोर्ट / हम आपसेजड़ुेरहेंगे। आप हमसेजड़ुेरहि ए। धन्यवाद

“भगवन श्री राम प्रसाद अति शय सौभाग्य स्मारक स्थल”
भगवन धाम गोहाना
सचं ालन - आर्य वज्र स्वाध्याय सघं (रजि .)

भगवन श्री राम प्रसाद जी महाराज वर्तमर्त ान यगु में, वर्धमर्ध ान महावीर जसै ेपवि त्र जीवन आचरण के सतं हुए हैं जि नका जन्म 9 मई 1930, दीक्षा सन्यास 18 जनवरी 1945 तथा स्वर्ग गमन 18 जलु ाई 2007 को हुआ । बचपन सेबाल जति , बाल ब्रह्मचारी, अति शय लब्धि सपं न्न, वाक्सि द्धि के सतं , नजरों सेचमत्कार करनेवाले, शब्दों सेवरदान बरसानेवाले, सतं हुए हैं। 14 भाषाओंके पारंगत पडिं डित, नि र्मो ही, नि र्लो भी, अल्प वस्त्रों मेंसाक्षात ब्रह्मा का स्वरूप रखतेथे। उनकी कृपा सेभारत भर के जनै , अजनै लाभान्वि त रहे। वेएक कौम, एक धर्म के नहीं, अपि तुमानव मात्र के सष्टिृष्टि के प्रत्येक प्राणी के पज्ू य हुए । उनका जीवन सर्व जीव कल्याण अभय की कामना भावना सेभरा था।
उनके स्वर्ग गमन पर, उनकी चामत्कारि क वि भतिूतियों को, साक्षात जीवतं रखनेके लि ए, गोहाना में वजीरपरुा रोड पर, आर्य वज्र स्वाध्याय सघं के गरुु भक्तों नेउनका अति शय सौभाग्य स्मारक स्थल का नि र्मा ण करवाया। उनके दैवि क एवं आध्यात्मि क चमत्कारों की कृपा सेलाभान्वि त, नर नारी प्रति दि न दरू-दरू से, इस तीर्थ स्थल की यात्रा के लि ए यहांकी यात्रा करतेहैं। यहांआनेवालों को, शांति एवंआनदं की अनभु तिूति समाधि स्थल की परि क्रमा करनेसेवि शषे प्राप्त होती है। अकल्पि त अघटि त दि व्य उपलब्धि यां होती है। यह स्थल भक्ति एवं चामत्कारि क पजू ा स्थल के रूप मेंनि रंतर, वद्ृधि गत प्रति ष्ठा प्राप्त करता जा रहा है।
इस अति शय स्थल पर प्रत्येक माह की 18 तारीख को वि शाल सत्सगं का आयोजन होता है। भक्ति स्ततिुति भजनों के साथ उपस्थि त सतं साध्वी मडं ल के गणु गान के साथ भगवन श्री की चामत्कारि क प्रार्थनर्थ ा होती है। उससे पर्वू र्व“ ॐ नमो भगवतेश्री राम प्रसादाय” का 27 बार भाव वि भोर जाप कर लोग अनतं आनदं का अनभु व करतेहैं। उनके मन में व्याप्त कुष्ठा, भय, शौक, पीड़ा, चि तं ा, अभाव, पजू ाभाव, धनाभाव, सौभाग्य, दर्बुलर्ब ता, व्यापारि क हानी के कारण स्वत: नष्ट हो जातेहैं। अपनी मनोकामनाओं की अभीष्टपर्तिूर्ति प्राप्त करनेवालेयहां “गौतम प्रसादी “ का प्रसाद चढ़ातेहैं।
यह गौतम प्रसादी “प्रचलि त सवा मणि ” प्रथा सेपर्णू तर्ण : भि न्न है। भक्तगण भाई-बहन, अपनी मनोकामना भगवन श्री के चरणों में रखकर गौतम प्रसादी की मन्नत मांगतेहैं। जि सका सघं ने7200 रुपए (वर्तमर्त ान का) मापदंड रखा है। (यह समयानकुूल स्थि ति के साथ समय-समय पर बढ़ाया जा सकता है।) वेअपनी मन्नत या भावना यहां पर लि खवा कर जातेहैं, सघं उनको समय देता है, उस नि यत माह की 18 तारीख सेपर्वू र्वसघं उन्हें सचू ना देता है। गौतम प्रसादी का प्रसाद शद्ुध देसी घी, सेइसी परि सर मेंलड्डुओं के रूप मेंबनाया जाता है। प्रत्येक गौतम प्रसादी लगानेवालेपरि वार को 5 कि लो देकर, बाकी उपस्थि त भक्तों मेंवि तरि त कि या जाता है। इस चमत्कारि क दि व्य प्रसाद को पानेके लि ए लबं ी कतारेलगती हैं। भक्ति भरा प्रसाद अत्यधि क सस्ुवादुहोता है इस प्रसाद को, प्रसाद समझ कर, खानेवालेशगु र के पेसटें भी शगु र वद्ृधि सेरहि त रहतेहैं।
विशषेता
- स्थल की यात्रा सेमि लता हैमहान सौभाग्य दीपावली- रक्षाबधं न- होली आदि पर वि शषे उपासना
- भतू प्रेत आदि बाधाओं सेमि लती हैमक्तिुक्ति
- हर तरह के अभाव समाप्ति की ओर बढ़ जातेहैं
- अपत्रु, बाँझ नारी को पत्रु लाभ का दि व्य चमत्कार।
- व्यापार, परिवार, स्वास्थ्य मेंमन इच्छि त उपलब्धि
- अनेक व्याधि यों सेमक्तिुक्ति
आप सादर आमत्रिंत है
- अपनेसाल भर के टूर प्रोग्राम में, इस दि व्य स्थल की अवश्य यात्रा करें
- गौतम प्रसादी के लाभ के साथ, अनतं सौभाग्य के द्वार खोलें
- स्मारक स्थल पर ऐति हासि क म्यजिूजियम की यात्रा अवश्य करें
- गौतम प्रसादी प्रत्येक माह भी लगाई जा सकती हैं
- साल भर गौतम प्रसादी लगानेवालेअखडं सौभाग्य प्राप्त करतेहैं
- दि व्य चमत्कारों सेस्वयंको, चामत्कारि क जीवन, सखु ी जीवन के लाभ सेलाभान्वि त करें
- विशषे
- लगातार12 माह तक हर माह की
- 18 तारीख को सौभाग्य स्थल की
- 29 परि क्रमा करनेवालेभक्त को अनतं लाभ मि लता है
- 18 जलु ाई के नोट “भगवन श्री देवलोक गमन ति थि पर एक बड़ी गौतम